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यशवंतरावजी की नम्रता

एक बूढी फटी हुई साडी में कुछ लपेटकर लायी थी । बुढापे के कारण थरथर काँपते-काँपते यशवंतरावजी से मिलने का प्रयत्‍न कर रही थी । लेकिन पुलिस ने उस बूढी को यशवंतरावजी के पास जाने नहीं दिया । यशवंतरावजी ने यह देखा । उन्होंने उस बूढी को अपने पास बुलाया और पूछा -'क्यों आयी थी माँजी ?'

बूढीने उत्तर दिया - 'सभी गाँव यशवंत की प्रशंसा करता है । इसलिए उसे यह फूलों का हार देने की इच्छा है । इसलिए आयी हूँ ।' उसने फटी हुई साडी में से वह फूलों का हार बाहर निकाला और वह हार उसने यशवंतरावजी को दिया और यशवंतरावजी ने वह हार लिया और बूढी के गले में डाल दिया और उन्होंने उसके पैरोंपर मस्तक रखकर नमस्कार किया । उसके बाद उन्होंने वेणूताईजी से उस बूढी को खाना खिलाने के लिए कहा ।

है ऐसी नम्रता किसी बडे नेता के पास ?

यशवंतरावजी की कृपा, प्रेम और सहानुभूति

बागलाण प्रांत में एक बूढी स्त्री थी । उसका एक लडका था । वह पढा लिखा था । वह नौकरी के लिए जिला अधिकारी कार्यालय में चक्कर काट रहा था । लेकिन उसे नौकरी नहीं मिली । इसलिए वह परेशान था । उसे मजदूरी के सिवा मार्ग नहीं था । उसने अपनी बूढी माँ से सारी हकीकत कह डाली । उसे काम न मिलने से माँ-बेटे दोनो भी बिना खाये सो जाते थे ।

एक दिन वह बूढी बागलाण प्रांत से दिल्ली चली गयी । दिल्ली स्टेशनपर उतरने पर जब वह स्टेशन के बाहर आयी तो चारों ओर रिक्षाएँ और गाडियाँ थी । इससे वह झुंझला गयी । उसने एक रिक्षावाले से पूछा - 'अरं बाबा, आमच्या महाराष्ट्र सायबाचं घर कुठं हाय, त्ये सांग. अन् म्या तुला दोन रुपये देती बग.' रिक्षावाले को दया आयी । उसे मालूम था कि महाराष्ट्र का साहब यशवंतरावजी चव्हाण हैं । उस रिक्षावाले ने उस बूढी को बंगले के फाटक के सामने छोड दिया और वह चला गया ।

छः बजे चव्हाणसाहब आये । उन्होंने देखा कि एक बूढी अपने फाटक के पास बैठी है ।  यशवंतरावजी झुँझला गये । वे गाडी से नीचे उतरे और बूढीसे पूछा - 'हे माँ, तू कहाँ से आयी है ?' उसने कहा - 'मैं बागलाण से आयी हूँ ।' 'तुम्हे किससे मिलना है और उनके पास तुम्हारा क्या काम है ?'

उसने कहा - 'आमच्या महाराष्ट्राचा साहेब इथं राहतो म्हणत्यात. आमी उपासीच राहतो बगा. पोरगं शिकलंय, पण जिल्ह्याचा अधिकारी असतू म्हणं की, त्याच्याकडं पोरगं गेलतं पण त्यानं काय नवकरी दिली नाय. मग आमी जगायचं कसं ? का फास घेऊन मरायचं ?'  बूढी की बाते सूनकर यशवंतरावजी उसे बंगले में ले गये । उन्होंसे उसे बंगले में दो दिन रख लिया और उन्होंने उस बूढीको साडी चोली पहनाकर सत्कार किया, खिलाया, पिलाया ।

उस बूढी के लडके पर अन्याय हुआ था । यशवंतरावजी उस समय नाशिक के संसद सदस्य थे । यशवंतरावजी ने कहाडोल और नाशिक के जिलाधिकारी को फोन लगाकर इस बूढी के लडके को नौकरी दिलवायी ।

यशवंतरावजी ने बूढी से कहा - 'तुम्हारे लडके को नौकरी दी है ।' बूढी खुश हुई और उसने यशवंतरावजी को आशीर्वाद दिया । यशवंतरावजी ने उस बूढी को वापसी का टिकट निकालकर रेल गाडी में बिठाकर नाशिक भेज दिया । जब यह वार्ता अखबार में छपकर आयी तब नाशिक के सभी लोगों को आश्चर्य लगा ।

यशवंतरावजी सर्वोच्च पदपर विराजमान थे । फिर भी उन्होंने सामान्य बूढी को जो सहानुभूति, प्रेम दिखाया यह प्रशंसनीय है ।

   

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